Thursday, July 9, 2026

Huma Qureshi Female Assassins Statement: फिल्मों में महिलाओं के टाइट कपड़ों पर भड़कीं हुमा कुरैशी, कहा- ‘यह पितृसत्ता की सोच है’

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भारतीय सिनेमा और बॉलीवुड ने समय-समय पर महिला किरदारों को पर्दे पर पेश करने के तरीकों में कई बदलाव देखे हैं। आज की अभिनेत्रियाँ सिर्फ रोने-धोने वाले या केवल ग्लैमर का तड़का लगाने वाले किरदारों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे स्क्रीन पर एक्शन करतीं, बंदूकें चलातीं और बड़े-बड़े जासूसी मिशनों को अंजाम देती हुई भी नजर आती हैं। लेकिन क्या पर्दे पर दिखने वाला यह महिला सशक्तिकरण वाकई उतना ही वास्तविक है, जितना दिखाया जाता है? इसी गंभीर और महत्वपूर्ण मुद्दे पर बॉलीवुड की मशहूर और बेबाक अभिनेत्री हुमा कुरैशी (Huma Qureshi) ने एक बड़ा और तीखा बयान देकर फिल्म इंडस्ट्री के भीतर चल रहे खोखलेपन को उजागर किया है। इन दिनों सोशल मीडिया और मीडिया गलियारों में Huma Qureshi female assassins statement सबसे बड़ी बहस का कारण बना हुआ है

जिसमें हुमा ने फिल्मों में महिला सीक्रेट एजेंट्स और किलर्स (हत्यारों) को चमड़े के बेहद टाइट कपड़ों (hyper-sexualised tight-fitting clothes) में दिखाए जाने की परंपरा की कड़ी आलोचना की है। हुमा का मानना है कि पर्दे पर महिलाओं का यह अत्यधिक कामुक चित्रण असल में हमारी रीढ़ में बसी पितृसत्तात्मक सोच (patriarchy) का ही नतीजा है, जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है।

Huma Qureshi Female Assassins Statement: आखिर क्यों फिल्मों के इस चलन पर फूटा हुमा का गुस्सा?

हुमा कुरैशी हमेशा से ही उन अभिनेत्रियों में शुमार रही हैं जो पर्दे पर किसी भी घिसे-पिटे रूढ़िवादी ढर्रे (stereotypes) को तोड़ने में विश्वास रखती हैं। हाल ही में अपनी आगामी खोजी थ्रिलर (investigative thriller) फिल्म ‘बयान’ (Bayaan) के सिलसिले में बात करते हुए उन्होंने इस विषय पर खुलकर अपनी बात रखी। हुमा ने फिल्मों में काम करने वाले निर्देशकों और लेखकों की सोच पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब भी हिंदी सिनेमा में किसी महिला को एक खतरनाक हत्यारे (assassin) या एक गुप्त एजेंट के रूप में पेश किया जाता है, तो सबसे पहले उनके पहनावे को लेकर एक अजीब और हास्यास्पद धारणा अपनाई जाती है।

इस विषय को गहराई से समझाते हुए Huma Qureshi female assassins statement सामने आया, जिसमें उन्होंने कहा, “यह सोचना ही बेहद मजाकिया और तर्कहीन है कि कोई महिला किसी बेहद गुप्त या खतरनाक मिशन पर जा रही है, जहाँ उसे भागना है, छिपना है और अपनी जान बचानी है, और वह चमड़े के ऐसे तंग और टाइट कपड़े पहनकर जाएगी जिसमें वह ठीक से सांस भी न ले पाए।” हुमा का यह बयान सीधे तौर पर उन सभी बड़ी कमर्शियल फिल्मों की तरफ इशारा करता है जहाँ महिला एक्शन स्टार्स को केवल एक विजुअल डिलाइट (आंखों को अच्छा लगने वाला माध्यम) बनाकर छोड़ दिया जाता है। हुमा के इस बयान ने दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम मनोरंजन के नाम पर आज भी महिलाओं को केवल एक वस्तु (commodity) के रूप में ही देखना पसंद करते हैं?

‘हाइपर-सेक्सुअलाइजेशन’ और पितृसत्ता का गहरा संबंध

हुमा कुरैशी ने अपने बयान में जिस सबसे महत्वपूर्ण शब्द का इस्तेमाल किया, वह था ‘हाइपर-सेक्सुअलाइजेशन’ (किरदारों को जरूरत से ज्यादा कामुक दिखाना) और इसे उन्होंने सीधे तौर पर पितृसत्ता यानी पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता (patriarchal mindset) से जोड़ा। उन्होंने कहा कि जब किसी फिल्म को बनाने वाले, उसे लिखने वाले और उसे निर्देशित करने वाले ज्यादातर पुरुष होते हैं, तो वे महिला किरदारों को भी उसी नजरिए (male gaze) से देखते हैं।

एक सीक्रेट एजेंट या किलर का काम दिमाग, रफ्तार और चालाकी का होता है। लेकिन फिल्मों में उनके इन गुणों को पीछे छोड़ते हुए इस बात पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है कि वह स्क्रीन पर कितनी हॉट या ग्लैमरस लग रही हैं। हुमा के अनुसार, पुरुषों की इसी सोच के कारण पर्दे पर महिलाओं के कपड़ों को इतना छोटा या तंग कर दिया जाता है ताकि वह पुरुष दर्शकों को आकर्षित कर सकें। यह न केवल उस महिला किरदार की क्षमता और बुद्धिमत्ता का अपमान है, बल्कि यह उस वास्तविक पेशे का भी मजाक उड़ाता है जिसमें महिला अधिकारी या जासूस दिन-रात काम करती हैं।

Huma Qureshi Female Assassins Statement: असल जिंदगी बनाम रील लाइफ का खोखला अंतर

अगर हम वास्तविक दुनिया की बात करें, तो खुफिया एजेंसियों (जैसे RAW, IB, या CIA) में काम करने वाली महिला अधिकारी या पुलिस विभाग की जासूस कभी भी ऐसे कपड़े नहीं पहनतीं जो ध्यान आकर्षित करें। उनका मुख्य मकसद ही भीड़ में घुल-मिल जाना और अदृश्य रहना होता है। वे ऐसे आरामदायक और ढीले कपड़ों का चुनाव करती हैं जिनमें वे आसानी से हथियारों को छुपा सकें, जरूरत पड़ने पर दीवारों को फांद सकें या लंबी दौड़ लगा सकें।

लेकिन बॉलीवुड की रील लाइफ इसके बिल्कुल विपरीत चलती है। यहाँ महिला का हत्यारा या एजेंट होना तब तक स्वीकार नहीं किया जाता, जब तक कि वह हाई हील्स पहनकर और चमकीले, टाइट जंपसूट में स्टंट न करे। हुमा ने इसी अंतर को रेखांकित करते हुए कहा कि अब समय आ गया है जब सिनेमा को इस अतार्किक और काल्पनिक दुनिया से बाहर निकलकर वास्तविकता को अपनाना चाहिए। इसी वजह से Huma Qureshi female assassins statement को फिल्म समीक्षकों द्वारा एक बेहद जरूरी और समय के अनुकूल उठाया गया कदम माना जा रहा है, जो फिल्म निर्माताओं को अपनी स्क्रिप्टिंग और कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग के तरीकों को दोबारा बदलने पर मजबूर करेगा।

आगामी फिल्म ‘बयान’ (Bayaan) में हुमा का रियलिस्टिक अवतार

हुमा कुरैशी सिर्फ बातें करने में विश्वास नहीं रखतीं, बल्कि वे अपनी फिल्मों और किरदारों के जरिए अपनी इस सोच को साबित भी करती हैं। उनकी आने वाली फिल्म ‘बयान’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इस फिल्म में वह एक पुलिस अधिकारी और जांचकर्ता (investigator) की भूमिका निभा रही हैं। इस किरदार के लिए उन्होंने किसी भी तरह के लाउड मेकअप, फैंसी हेयरस्टाइल या ग्लैमरस कपड़ों को पूरी तरह से मना कर दिया।

फिल्म का नामहुमा का किरदारलुक और पहनावे की विशेषता
बयान (Bayaan)पुलिस अफसर / जांचकर्ताबिना मेकअप, साधारण और आरामदायक कपड़े (वास्तविक लुक)
पारंपरिक बॉलीवुड फिल्मेंमहिला सीक्रेट एजेंट / किलरचमड़े के टाइट सूट, हाई हील्स और लाउड मेकअप (काल्पनिक लुक)

हुमा ने बताया कि ‘बयान’ में उनके लुक को इतना वास्तविक और जमीन से जुड़ा हुआ रखा गया है कि दर्शक उन्हें देखते ही एक असली और कड़क अफसर के रूप में स्वीकार करेंगे। वे मानती हैं कि जब एक महिला स्क्रीन पर बिना किसी तामझाम के सिर्फ अपने अभिनय और मजबूत व्यक्तित्व के दम पर दर्शकों को प्रभावित करती है, तो वही सच्चा सिनेमा होता है।

Huma Qureshi Female Assassins Statement: दो पक्षों में बंटी सोशल मीडिया की जनता

हुमा कुरैशी के इस बेबाक बयान के सामने आते ही सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर एक नई बहस छिड़ गई है। आम जनता से लेकर सिनेमा के दीवानों तक, हर कोई इस मुद्दे पर अपनी राय रख रहा है और इंटरनेट यहाँ भी दो अलग-अलग विचारों में बंटा हुआ दिखाई दे रहा है:

1. हुमा के बयान का समर्थन करने वाले लोग

बड़ी संख्या में नेटिजन्स और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने हुमा कुरैशी की इस बात की जमकर तारीफ की है। लोगों का कहना है कि आखिरकार किसी मुख्यधारा की अभिनेत्री ने इंडस्ट्री के इस छिपे हुए दोहरे मापदंड (double standard) पर आवाज उठाई है। फैंस का कहना है कि वे भी पर्दे पर एक्ट्रेसेस को सिर्फ बॉडी शो करने के बजाय एक वास्तविक और मजबूत इंसान के रूप में देखना चाहते हैं।

2. मनोरंजन और व्यावसायिक सिनेमा का तर्क देने वाले लोग

दूसरी तरफ, कुछ आलोचकों और व्यावसायिक सिनेमा के समर्थकों का मानना है कि फिल्में असल जिंदगी का हूबहू दस्तावेज नहीं होतीं, वे मनोरंजन और ‘लार्जर दैन लाइफ’ (कल्पना से परे) अनुभवों के लिए बनाई जाती हैं। उनका तर्क है कि अगर जेम्स बॉन्ड जैसे पुरुष किरदार हमेशा महंगे सूट और लग्जरी घड़ियों में घूम सकते हैं, तो महिला किरदारों को भी स्टाइल और ग्लैमर के साथ दिखाने में कोई बुराई नहीं है।

निष्कर्ष: क्या बदलेगी बॉलीवुड की यह पुरानी परिपाटी?

हुमा कुरैशी का यह बयान सिर्फ एक फिल्म के प्रमोशन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर हमारी फिल्मों की लेखनी और निर्माण प्रक्रिया को एक आईना दिखाता है। जब तक हम महिला किरदारों की बुद्धिमत्ता, ताकत और उनके अभिनय कौशल से ज्यादा उनके शारीरिक रूप-रंग और कपड़ों को महत्व देते रहेंगे, तब तक हम एक सच्चे और प्रगतिशील सिनेमा का निर्माण नहीं कर पाएंगे।

हुमा ने यह साबित कर दिया है कि एक कलाकार के रूप में उनकी जिम्मेदारी सिर्फ कैमरे के सामने खड़े होकर लाइन्स बोलना नहीं है, बल्कि समाज और सिनेमा में चल रही गलत प्रथाओं पर उंगली उठाना भी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या आने वाले समय में बॉलीवुड के बड़े निर्माता और निर्देशक हुमा की इस बात से कोई सीख लेते हैं और महिलाओं को पर्दे पर अधिक सम्मानजनक और वास्तविक रूप में पेश करते हैं या नहीं।

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