भारतीय सिनेमा में अंधविश्वास और मान्यताओं का इतिहास बेहद पुराना रहा है। कभी रिलीज डेट के लिए ज्योतिषी की मदद ली जाती है, तो कभी खास अल्फाबेट से फिल्मों के नाम तय किए जाते हैं। लेकिन हिंदी सिनेमा के 100 साल से भी लंबे सफर में एक ऐसा नाम रहा है जिसे ट्रेड एनालिस्ट Bollywood unluckiest movie title का तमगा देते हैं। यह वह शब्द है जिससे जुड़ा कोई भी प्रोजेक्ट बॉक्स ऑफिस पर अपनी नैया पार नहीं लगा सका। जब भी किसी डायरेक्टर ने इस नाम पर दांव लगाया, नतीजा सिर्फ भारी वित्तीय नुकसान, करियर का ढलान या निर्माताओं की कंगाली ही रहा। 40 सालों के दौरान इस शीर्षक के इर्द-गिर्द 9 फिल्में बनीं और सभी एक के बाद एक औंधे मुंह गिर गईं।

क्या है ‘कर्ज’ और क्यों बना यह Bollywood Unluckiest Movie Title

वह बदनाम और बदनसीब शब्द कोई और नहीं बल्कि ‘कर्ज’ (Karz) है। हिंदी सिनेमा में जब भी शीर्षक में ‘कर्ज’ शब्द जुड़ा, उसने बॉक्स ऑफिस पर निर्माताओं पर सचमुच का भारी कर्ज लाद दिया। ट्रेड पंडितों के लिए यह शब्द किसी बुरे सपने से कम नहीं रहा। इसी वजह से फिल्म समीक्षक इसे खुले तौर पर Bollywood unluckiest movie title के रूप में दर्ज करते हैं।

फिल्म इंडस्ट्री में सफलता के फॉर्मूले बदलते रहते हैं, लेकिन इस टाइटल का रिकॉर्ड कभी नहीं बदला। 1980 के दशक से लेकर 2016 तक, अलग-अलग दशकों में बड़े-बड़े निर्देशकों ने इस नाम का इस्तेमाल किया। कभी रीमेक के जरिए तो कभी नए किरदारों के साथ, लेकिन दर्शक हर बार सिनेमाघरों से गायब रहे। अंधविश्वास कहें या महज एक अजीब संयोग, ‘कर्ज’ नाम का शाप हर बार सच साबित हुआ।

जब ऋषि कपूर डिप्रेशन में चले गए: 1980 की मूल ‘कर्ज’ का दर्द

1980 में जाने-माने निर्देशक सुभाष घई ने एक पुनर्जन्म आधारित म्यूजिकल थ्रिलर बनाई, जिसका नाम रखा गया ‘कर्ज’। फिल्म में उस दौर के चॉकलेटी हीरो ऋषि कपूर, टीना मुनीम और सिमी गरेवाल मुख्य भूमिकाओं में थे। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत चार्टबस्टर रहा और गाने आज भी अमर हैं। इसके बावजूद सिनेमाघरों में रिलीज होते ही यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई।

इस विफलता ने ऋषि कपूर को अंदर से तोड़कर रख दिया था। ऋषि कपूर इस फिल्म से भारी उम्मीदें लगाए बैठे थे। लगातार असफलता और बड़े बजट के डूबने के सदमे ने उन्हें गहरे डिप्रेशन में धकेल दिया। उन्होंने अपनी बायोग्राफी ‘खुल्लम खुल्ला’ में भी स्वीकार किया था कि ‘कर्ज’ के फ्लॉप होने के बाद उन्हें सेट पर जाने से डर लगने लगा था और उन्हें लंबे समय तक मेडिकल काउंसिलिंग का सहारा लेना पड़ा। यही वह मोड़ था जिसने इस नाम को Bollywood unluckiest movie title की काली फेहरिस्त में सबसे ऊपर लाकर खड़ा कर दिया।

2008 का रीमेक: Bollywood Unluckiest Movie Title से मेकर्स हुए कंगाल और थमा उर्मिला का करियर

साल 2008 में जब सिंगर और म्यूजिक कंपोजर हिमेश रेशमिया अपने करियर के चरम पर थे, तब निर्देशक सतीश कौशिक ने उसी क्लासिक फिल्म का रीमेक बनाने का फैसला किया। न्यूमरोलॉजी का सहारा लेते हुए नाम की स्पेलिंग बदलकर ‘Karzzzz’ रखी गई ताकि कोई अपशकुन न रहे। मेकर्स ने इसे लगभग 24 करोड़ रुपये के भारी-भरकम बजट के साथ बड़े पैमाने पर शूट किया।

नतीजा पहले से भी ज्यादा भयानक निकला। फिल्म लाइफटाइम बिजनेस में महज 16 करोड़ रुपये के आसपास ही सिमट गई। वितरकों को भारी घाटा हुआ और प्रोडक्शन हाउस दिवालिया होने की कगार पर पहुँच गया। इस फ्लॉप का सबसे बड़ा खामियाजा भुगता मशहूर अभिनेत्री उर्मिला मातोंडकर ने, जिन्होंने कामिनी का नेगेटिव रोल निभाया था। इस फिल्म की ऐतिहासिक विफलता के बाद उर्मिला को बॉलीवुड में मेनस्ट्रीम लीड हीरोइन के तौर पर काम मिलना लगभग बंद हो गया। इस तरह एक बार फिर साबित हुआ कि यह सच में Bollywood unluckiest movie title साबित हो रहा था।

बॉक्स ऑफिस पर ‘कर्ज’ नाम से डूबीं 9 फिल्मों का कच्चा चिट्ठा

इस टाइटल की बर्बादी की दास्तान केवल दो फिल्मों तक सीमित नहीं है। अगर आंकड़ों पर नजर डालें, तो जब-जब किसी डायरेक्टर ने टाइटल में यह शब्द जोड़ा, टिकट खिड़की पर सन्नाटा ही पसरा मिला:

वर्षफिल्म का नाममुख्य कलाकारबॉक्स ऑफिस परिणाम
1980कर्जऋषि कपूर, सिमी गरेवालफ्लॉप (बाद में टीवी/म्यूजिक कल्ट)
1988कर्ज तेरे खून कासुनील पुरी, अनीता राजडिजास्टर
1990दूध का कर्जजैकी श्रॉफ, नीलम कोठारीऔसत से नीचे / फ्लॉप
1990प्यार का कर्जमिथुन चक्रवर्ती, धर्मेंद्रफ्लॉप
1991कर्ज चुकाना हैगोविंदा, जूही चावलाफ्लॉप
1991महान कर्जराज बब्बर, किमी काटकरडिजास्टर
2002कर्ज: द बर्डन ऑफ ट्रुथसनी देओल, सुनील शेट्टीफ्लॉप
2008Karzzzzहिमेश रेशमिया, उर्मिला मातोंडकरमहा-डिजास्टर (मेकर्स दिवालिया)
2016दूध का कर्ज (रीमेक/भोजपुरी-हिंदी)दिनेश लाल यादव, खेसारीबॉक्स ऑफिस पर नाकाम

हर दौर के बड़े सितारों जैसे सनी देओल, गोविंदा, मिथुन चक्रवर्ती और जैकी श्रॉफ तक ने इस टाइटल वाली फिल्मों में हाथ आजमाया, लेकिन कोई भी स्टार पावर इस नाम के दुर्भाग्य को जीत में नहीं बदल सकी।

‘कर्ज: द बर्डन ऑफ ट्रुथ’ (2002): जब दो बड़े एक्शन स्टार्स भी नहीं बचा सके फिल्म

साल 2002 में निर्देशक हैरी बावेजा ने एक बड़ा एक्शन ड्रामा प्लान किया। पर्दे पर दो दिग्गज एक्शन हीरोज सनी देओल और सुनील शेट्टी को आमने-सामने खड़ा किया गया। साथ में शिल्पा शेट्टी लीड रोल में थीं। सनी देओल उस समय ‘गदर: एक प्रेम कथा’ की ऐतिहासिक कामयाबी के बाद दर्शकों के सबसे बड़े चहेते बने हुए थे।

ट्रेड को पूरी उम्मीद थी कि सनी देओल का आक्रामक अंदाज फिल्म को ब्लॉकबस्टर बना देगा। मगर फिल्म का नाम था ‘कर्ज: द बर्डन ऑफ ट्रुथ’। रिलीज के पहले हफ्ते में ही दर्शकों ने फिल्म को पूरी तरह नकार दिया। फिल्म का बजट बहुत बड़ा था, जिसके कारण वितरकों को करोड़ों का नुकसान उठाना पड़ा। सनी देओल का जादू भी इस शीर्षक के आगे बेअसर साबित हुआ।

बॉलीवुड में अंधविश्वास और Bollywood Unluckiest Movie Title से जुड़ा विज्ञान

बॉलीवुड का इतिहास गवाह है कि यहाँ नामकरण को लेकर कड़े नियम माने जाते हैं। करण जौहर सालों तक अपनी हर फिल्म की शुरुआत ‘K’ अक्षर से करते रहे। एकता कपूर ने टीवी और फिल्मों दोनों में न्यूमरोलॉजी को ब्रह्मास्त्र की तरह इस्तेमाल किया। राकेश रोशन आज भी अपनी हर फिल्म का नाम ‘K’ अक्षर से ही शुरू करते हैं और उनका ट्रैक रिकॉर्ड शानदार रहा है।

इसके ठीक उलट, जब भी Bollywood unluckiest movie title यानी ‘कर्ज’ की बात आती है, इंडस्ट्री के बड़े लेखक और निर्देशक अब इस शब्द से किनारा करने में ही अपनी भलाई समझते हैं। कई स्क्रिप्ट राइटर्स का कहना है कि जब कोई कहानी इस थीम पर लिखी भी जाती है, तो मार्केटिंग टीम सबसे पहले यह शर्त रखती है कि टाइटल में ‘कर्ज’ शब्द किसी भी हाल में नहीं आना चाहिए।

सबक और फिल्मी गलियारों की कड़वी सच्चाई

सिनेमा का कारोबार केवल ग्लैमर और शोहरत का नहीं बल्कि अरबों रुपयों के जोखिम का खेल है। किसी भी प्रोजेक्ट के फेल होने पर सैकड़ों कर्मचारियों, स्पॉट बॉयज और टेक्नीशियनों की रोजी-रोटी पर असर पड़ता है। 1980 से लेकर आज तक जब भी कोई निर्माता इस शीर्षक की ओर आकर्षित हुआ, उसे केवल भारी कर्ज और कोर्ट-कचहरी के चक्कर ही नसीब हुए।

ऋषि कपूर का टूटना, हिमेश रेशमिया के एक्टिंग करियर को तगड़ा झटका लगना और उर्मिला मातोंडकर का मेनस्ट्रीम से लगभग गायब हो जाना यह साफ बताता है कि कई बार कुछ नाम परदे पर भारी तबाही लेकर आते हैं। 9 फिल्मों का लगातार धाराशायी होना कोई आम इत्तेफाक नहीं हो सकता।

आज के डिजिटल और कॉरपोरेट युग में जब स्टूडियोज हर एक फैसले पर डेटा एनालिटिक्स की मदद लेते हैं, तब भी यह शीर्षक बॉलीवुड के रिकॉर्ड रूम में एक चेतावनी की तरह दर्ज है। Filmy Galaxy की रिपोर्ट के अनुसार, फिल्म इंडस्ट्री अब यह अच्छी तरह समझ चुकी है कि जोखिम लेना अच्छी बात है, लेकिन इतिहास के पन्नों में दर्ज सबसे मनहूस नाम पर दांव लगाना सीधे तौर पर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है।

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