हिंदी सिनेमा के इतिहास में साल 1973 एक ऐसा मील का पत्थर साबित हुआ, जिसने न केवल बॉलीवुड की दिशा बदली बल्कि एक ऐसे सितारे का उदय किया जिसने आगे चलकर पूरे दौर पर राज किया। यह ऐतिहासिक मोड़ साबित हुई Amitabh Bachchan Film Zanjeer, जिसने भारतीय सिनेमा को एक नया तेवर, नया मिजाज और पहला ‘एंग्री यंग मैन’ दिया। आज जब हम इस क्लासिक फिल्म को याद करते हैं, तो इसे सफलता की सबसे बड़ी मिसाल माना जाता है। हालांकि, बहुत कम लोग जानते हैं कि इस मास्टरपीस की नींव निराशा, लगातार रिजेक्शन्स और एक फ्लॉप हो रहे अभिनेता के अस्तित्व की लड़ाई पर रखी गई थी।
1970 के दशक की शुरुआत और Amitabh Bachchan Film Zanjeer बनने की कहानी
1970 के शुरुआती दौर में हिंदी सिनेमा में मुख्य रूप से रोमांटिक और संगीतमय फिल्मों का बोलबाला था। राजेश खन्ना अपने चार्म से देश भर के दर्शकों को दीवाना बना चुके थे। प्रेम कहानियां, खूबसूरत वादियों में फिल्माए गए गाने और मासूम रोमांस उस समय की सबसे सुरक्षित फार्मूला फिल्में मानी जाती थीं। इसी दौर में दो युवा लेखकों—सलीम खान और जावेद अख्तर (सलीम-जावेद)—ने व्यवस्था के खिलाफ सुलगते एक नौजवान की कहानी लिखी। यह कहानी थी पुलिस इंस्पेक्टर विजय खन्ना की, जिसके सीने में बचपन के एक दर्दनाक हादसे का गहरा सदमा और सिस्टम के प्रति तीव्र आक्रोश था।
लेखक इस स्क्रिप्ट को लेकर कई बड़े निर्माताओं के पास गए, लेकिन हर कोई हैरान था क्योंकि फिल्म के मुख्य नायक पर कोई भी रोमांटिक गाना फिल्माया नहीं जाना था। नायक हंसता नहीं था, न ही वह फूलों के पीछे नाचता था। इस क्रांतिकारी कहानी को आखिरकार निर्देशक प्रकाश मेहरा ने समझा और उन्होंने इसे पर्दे पर उतारने का जोखिम उठाने का फैसला किया। यही वह समय था जब Amitabh Bachchan Film Zanjeer के निर्माण की वास्तविक प्रक्रिया शुरू हुई।
धर्मेंद्र, देव आनंद और राज कुमार: जब दिग्गज सितारों ने ठुकरा दी फिल्म
यह जानकर किसी को भी आश्चर्य हो सकता है कि प्रकाश मेहरा की पहली पसंद कभी अमिताभ बच्चन नहीं थे। सलीम-जावेद ने यह स्क्रिप्ट सबसे पहले धर्मेंद्र को ध्यान में रखकर तैयार की थी। धर्मेंद्र को कहानी पसंद भी आई थी और उन्होंने इसके अधिकार भी हासिल कर लिए थे। लेकिन उस समय पारिवारिक और तारीखों के तालमेल के कारण वह इस प्रोजेक्ट से अलग हो गए। धर्मेंद्र के पीछे हटने के बाद फिल्म निर्माताओं के सामने मुख्य भूमिका के लिए एक बड़ा संकट खड़ा हो गया।
इसके बाद यह रोल सदाबहार अभिनेता देव आनंद को ऑफर किया गया। देव आनंद ने पूरी स्क्रिप्ट सुनी, लेकिन वह इस बात से असहमत थे कि उनके किरदार पर कोई गाना नहीं था। उनका मानना था कि उनके प्रशंसक उन्हें बिना गानों के स्वीकार नहीं करेंगे, इसलिए उन्होंने प्रस्ताव ठुकरा दिया।
बात यहीं नहीं रुकी; निर्माताओं ने उस दौर के धाकड़ अभिनेता राज कुमार से भी संपर्क साधा। राज कुमार को फिल्म की कहानी तो पसंद आई, लेकिन उन्होंने मद्रास (चेन्नई) में शूटिंग करने की शर्त रख दी क्योंकि उन्हें मुंबई के स्टूडियो का माहौल रास नहीं आ रहा था। निर्देशक प्रकाश मेहरा इस मांग को स्वीकार नहीं कर सके। यहां तक कि दिलीप कुमार को भी यह कहानी पसंद आई, लेकिन उन्हें लगा कि इस किरदार में उनके अभिनय के लिए ज्यादा नए आयाम नहीं थे। एक के बाद एक शीर्ष सितारों द्वारा खारिज किए जाने के बाद Amitabh Bachchan Film Zanjeer लगभग अधर में लटक चुकी थी।
जब डूबते करियर के साथ Amitabh Bachchan Film Zanjeer से जुड़े बिग बी
दूसरी तरफ, अमिताभ बच्चन उस समय अपने करियर के सबसे कठिन और अंधकारमय दौर से गुजर रहे थे। ‘सात हिंदुस्तानी’ से शुरुआत करने के बाद वह लगातार करीब 11-12 असफल फिल्में दे चुके थे। ‘परवाना’, ‘रेशमा और शेरा’, ‘संजोग’ और ‘बंसी बिरजू’ जैसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर दम तोड़ चुकी थीं। फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें ‘अनलकी’ और ‘फ्लॉप एक्टर’ का ठप्पा मिलने लगा था। अमिताभ इतने निराश हो चुके थे कि वह बोरिया-बिस्तर बांधकर वापस अपने घर इलाहाबाद लौटने का गंभीर मन बना चुके थे।
तभी सलीम-जावेद ने फिल्म ‘बॉम्बे टू गोवा’ के एक फाइट सीन में अमिताभ बच्चन के चेहरे की तीव्रता और उनकी आंखों में छिपे गुस्से को देखा। दोनों लेखकों को तुरंत अहसास हुआ कि इंस्पेक्टर विजय के किरदार के लिए जिस आंतरिक पीड़ा और ज्वालामुखी की जरूरत है, वह केवल इसी लंबे कद वाले अभिनेता में है। उन्होंने निर्देशक प्रकाश मेहरा से अमिताभ के नाम की पुरजोर सिफारिश की। शुरुआत में प्रकाश मेहरा हिचकिचाए, लेकिन जब उन्होंने अमिताभ का स्क्रीन टेस्ट और उनकी आवाज का वजन देखा, तो उन्हें यकीन हो गया कि Amitabh Bachchan Film Zanjeer को उनका असली नायक मिल चुका है।
11 मई 1973: जब रिलीज हुई Amitabh Bachchan Film Zanjeer और बदल गया इतिहास
फिल्म का निर्माण शुरू हुआ, लेकिन मुश्किलें कम नहीं हुईं। कई वितरकों ने एक फ्लॉप अभिनेता के कारण फिल्म खरीदने से इनकार कर दिया। जया भादुड़ी (अब बच्चन), जो उस समय एक स्थापित और सफल अभिनेत्री थीं, ने केवल अमिताभ के करियर को सहारा देने के लिए इस छोटे से फीमेल लीड रोल को स्वीकार किया। साथ ही, प्राण साहब ने ‘शेर खान’ का अविस्मरणीय किरदार निभाकर फिल्म में जान फूंक दी।
11 मई 1973 को जब Amitabh Bachchan Film Zanjeer सिनेमाघरों में रिलीज हुई, तो शुरुआती तीन-चार दिनों तक सिनेमा हॉल में सन्नाटा पसरा रहा। ऐसा लगा कि यह फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर ढेर हो जाएगी। लेकिन चौथे दिन अचानक मुंबई और उत्तर भारत के सिनेमाघरों के बाहर टिकट खिड़कियों पर ऐसी भीड़ उमड़ी कि पुलिस को लाठीचार्ज तक करना पड़ा।
दर्शकों ने जब बड़े पर्दे पर अमिताभ बच्चन को पुलिस स्टेशन की कुर्सी पर पैर मारने से रोकते हुए यह डायलॉग बोलते सुना—“जब तक बैठने को न कहा जाए, शराफत से खड़े रहो, ये पुलिस स्टेशन है, तुम्हारे बाप का घर नहीं”—तो पूरा थिएटर सीटियों और तालियों से गूंज उठा। फिल्म रातों-रात ब्लॉकबस्टर साबित हुई और इसके साथ ही भारतीय सिनेमा को उसका सबसे बड़ा सितारा मिल गया।
‘एंग्री यंग मैन’ का उदय और भारतीय समाज पर इसका असर
Amitabh Bachchan Film Zanjeer केवल एक व्यावसायिक सफलता नहीं थी, बल्कि यह 70 के दशक के भारतीय युवाओं की दबी हुई आवाज बन गई थी। उस दौर में देश बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, महंगाई और व्यवस्थागत खामियों से जूझ रहा था। आम जनता के भीतर जो आक्रोश पनप रहा था, उसे पर्दे पर विजय के रूप में एक चेहरा मिल गया।
इस फिल्म की सफलता ने हिंदी सिनेमा में रोमांटिक हीरोज के दौर को पीछे धकेल दिया और एक्शन-ड्रामा की एक नई लहर पैदा की। इसके बाद ‘दीवार’, ‘शोले’, ‘त्रिशूल’ और ‘डॉन’ जैसी कालजयी फिल्में आईं, लेकिन इन सभी ऐतिहासिक सफलताओं की नींव रखने वाली फिल्म Amitabh Bachchan Film Zanjeer ही थी।
निष्कर्ष
यदि 1973 में बॉलीवुड के दिग्गज सितारों ने इस फिल्म को न ठुकराया होता, तो शायद भारतीय सिनेमा का इतिहास आज कुछ और होता। रिजेक्शन के दौर से गुजरते हुए अपनी पहचान की तलाश कर रहे एक अभिनेता को जब सही मौका मिला, तो उसने अपनी तकदीर खुद लिख दी। यही कारण है कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में Amitabh Bachchan Film Zanjeer को हमेशा उस जादुई मोड़ के रूप में याद किया जाएगा जिसने एक संघर्षरत कलाकार को सदी के महानायक के सिंहासन पर बैठा दिया।




