बॉलीवुड गलियारों से एक ऐसी खबर आई है जिसने सिनेमा प्रेमियों को थोड़ा उदास और बहुत ज्यादा सोचने पर मजबूर कर दिया है। दिग्गज फिल्म निर्माता और अपने बेबाक अंदाज के लिए मशहूर महेश भट्ट ने हमेशा के लिए कैमरे के पीछे खड़े होना बंद करने का फैसला कर लिया है। जब इंटरनेट पर Mahesh Bhatt retirement from directing की खबरें तैरने लगीं, तो हर किसी के मन में बस एक ही सवाल था कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो चार दशकों से ज्यादा समय तक हिंदी सिनेमा को एक से बढ़कर एक नायाब फिल्में देने वाला यह जादूगर अचानक थम गया? खुद महेश भट्ट ने एक इंटरव्यू में साफ किया है कि आज के दौर में एक डायरेक्टर के तौर पर काम करने की आज़ादी ही नहीं बची है, जिसके कारण वे अब कोई नई फीचर फिल्म डायरेक्ट नहीं करेंगे।
47 फिल्में और 4 दशक का सफर: एक सुनहरे युग का अंत
महेश भट्ट सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा की एक पूरी संस्था हैं। उन्होंने साल 1974 में फिल्म ‘मंज़िलें और भी हैं’ से अपने निर्देशन के सफर की शुरुआत की थी। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने व्यावसायिक और समानांतर (Parallel) सिनेमा के बीच की दूरी को मिटा दिया।
अर्थ, सारांश, नाम, सड़क, ज़ख्म जैसी फिल्में इस बात का सबूत हैं कि वे इंसानी जज्बातों को पर्दे पर कितनी खूबसूरती और कड़वी सच्चाई के साथ उतार सकते थे। जब एक ऐसा इंसान, जिसने सिनेमा को अपनी ज़िंगगी के 40 साल से ज़्यादा दिए हों, अचानक यह कहे कि वो अब फिल्में नहीं बनाएगा, तो यह वाकई पूरी इंडस्ट्री के लिए एक युग का अंत है।
Mahesh Bhatt retirement from directing: क्यों थम गए इस महान डायरेक्टर के कदम?
सिनेमा के शौकीनों के लिए यह समझना बेहद जरूरी है कि इस फैसले के पीछे कोई व्यक्तिगत वजह या कमजोरी नहीं है, बल्कि इसके पीछे सिनेमा की बदलती दुनिया के प्रति एक गहरी निराशा है। जब हम Mahesh Bhatt retirement from directing के मुख्य कारणों को टटोलते हैं, तो समझ आता है कि महेश भट्ट आज के कॉर्पोरेट और एल्गोरिदम के ढर्रे से पूरी तरह ऊब चुके हैं।
भट्ट साहब का मानना है कि आज की फिल्में डायरेक्टर्स नहीं, बल्कि बोर्ड रूम में बैठे अधिकारी और डेटा तय कर रहे हैं। जब फिल्म बनने से पहले ही उसका एक-एक सीन, उसका क्लाइमेक्स और दर्शकों का रिएक्शन तक नंबर्स के खेल से तय होने लगे, तो वहाँ एक असली कलाकार के लिए कुछ भी नया करने की गुंजाइश नहीं रह जाती।
“आज कंटेंट पहले से तय होता है, कलाकार की आज़ादी कहाँ है?”
महेश भट्ट ने अपने इस फैसले को समझाते हुए एक बहुत ही कड़वी और सच्ची बात कही। उन्होंने कहा कि आज के समय में बहुत सारा कंटेंट पहले से ही ‘डिजाइन’ या ‘तय’ (Pre-decided) होता है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और बड़े-बड़े स्टूडियोज यह तय करते हैं कि जनता क्या देखना चाहती है और उसी हिसाब से फिल्ममेकर्स को काम करने को कहा जाता है।
“जब आपके पास कुछ नया आजमाने की, रिस्क लेने की या अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनने की आजादी ही नहीं होगी, तो आप एक डायरेक्टर के तौर पर केवल एक कठपुतली बनकर रह जाएंगे। कला कभी भी बंधनों में या किसी फॉर्मूले के तहत नहीं पनप सकती।” – महेश भट्ट
उनका कहना है कि आज का सिनेमा नंबर्स और व्यूअरशिप के पीछे भाग रहा है, जिससे एक रचनात्मक कलाकार की जगह बेहद सीमित हो गई है। वे इस तरह के माहौल में काम करके अपनी कला के साथ समझौता नहीं करना चाहते।
Mahesh Bhatt retirement from directing: क्या अब कभी सिनेमा से नहीं जुड़ेंगे महेश भट्ट?
फैंस के लिए राहत की बात सिर्फ इतनी है कि महेश भट्ट ने केवल निर्देशन (Direction) से दूरी बनाई है, कहानियों से नहीं। जब बात उठती है Mahesh Bhatt retirement from directing की, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वे घर बैठ जाएंगे।
भट्ट साहब ने साफ किया है कि वे फिल्मों का निर्माण (Production) करना जारी रखेंगे। इसके साथ ही, उनका पहला प्यार यानी ‘थिएटर और नाटक’ (Theatre Plays) हमेशा चलता रहेगा। थिएटर में आज भी वो आज़ादी और लाइव ऑडियंस का वो सच्चा रिस्पॉन्स मिलता है, जो आज के डिजिटल सिनेमा से गायब होता जा रहा है। वे अपनी प्रोडक्शन कंपनी ‘विशेष फिल्म्स’ के जरिए नए टैलेंट को मौका देते रहेंगे और रचनात्मक रूप से हमेशा सक्रिय रहेंगे।
कमबैक फिल्म ‘सड़क 2’ ही साबित हुई आखिरी फिल्म
आपको याद होगा कि साल 1999 में फिल्म ‘कारतूस’ के बाद महेश भट्ट ने निर्देशन से एक लंबा ब्रेक ले लिया था। इसके बाद करीब दो दशकों तक उन्होंने किसी फिल्म को डायरेक्ट नहीं किया। लेकिन साल 2020 में उन्होंने अपनी आइकॉनिक फिल्म सड़क के सीक्वल ‘सड़क 2’ से एक धमाकेदार कमबैक किया था, जिसमें उनकी बेटी आलिया भट्ट और संजय दत्त मुख्य भूमिकाओं में थे।
हालांकि, यह फिल्म कोरोना काल के दौरान ओटीटी पर रिलीज हुई थी और इसे दर्शकों से बहुत अच्छा रिस्पॉन्स नहीं मिला। अब यह पूरी तरह साफ हो चुका है कि सड़क 2 ही महेश भट्ट के पूरे करियर की आखिरी निर्देशित फिल्म के रूप में इतिहास में दर्ज हो चुकी है।
आज के दौर के फिल्ममेकर्स के लिए एक बड़ा सबक
महेश भट्ट का यह फैसला आज की युवा पीढ़ी और नए फिल्ममेकर्स के लिए एक बहुत बड़ा सबक और चेतावनी है। आज जहां हर कोई करोड़ों के क्लब में शामिल होने और ट्रेंडिंग टॉपिक्स पर फिल्में बनाने की होड़ में लगा है, वहीं एक बुजुर्ग और अनुभवी डायरेक्टर का यह कहना कि “यहाँ आज़ादी नहीं बची”, हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम वाकई अच्छा सिनेमा बना रहे हैं?
सिनेमा का मतलब केवल शानदार विजुअल्स या वीएफएक्स (VFX) नहीं होता, सिनेमा का मतलब होता है एक दिल को छू लेने वाली कहानी। और जब कहानियां ही एल्गोरिदम तय करने लगेगा, तो सिनेमा की आत्मा मर जाएगी।
निराशा के बीच एक उम्मीद की किरण
भले ही महेश भट्ट ने आज के सिस्टम से परेशान होकर यह कदम उठाया हो, लेकिन वे पूरी तरह से निराश नहीं हैं। उन्हें आज भी भारत के युवाओं और नए कहानीकारों पर पूरा भरोसा है।
उनका मानना है कि हर दौर में कुछ ऐसे ‘बागी’ (Rebels) पैदा होते हैं जो बने-बनाए ढर्रे को तोड़ते हैं। जब हर कोई एक जैसी फिल्में बना रहा होगा, तब कोई न कोई ऐसा बेबाक डायरेक्टर जरूर सामने आएगा जो सिस्टम के खिलाफ जाकर अपनी शर्तों पर ऐसी फिल्में बनाएगा जो इतिहास रचेंगी। भट्ट साहब को उसी नए दौर का इंतजार है।
निष्कर्ष: Mahesh Bhatt retirement from directing पर क्या है आपकी राय?
महेश भट्ट का निर्देशन छोड़ना बेशक बॉलीवुड के लिए एक बहुत बड़ा नुकसान है। उन्होंने हमें ‘आशिकी’ जैसी संगीतमय प्रेमकहानी दी, तो ‘ज़ख्म’ जैसी संवेदनशील फिल्म भी दी। उनके जाने से कैमरे के पीछे की वो कड़क और बेबाक आवाज़ अब शांत हो जाएगी जो कभी कलाकारों से उनका सर्वश्रेष्ठ काम करवा लेती थी।
भले ही Mahesh Bhatt retirement from directing की इस खबर ने फैंस को थोड़ा मायूस किया हो, लेकिन Filmy Galaxy की टीम यह उम्मीद करती है कि एक प्रोड्यूसर और मेंटर के तौर पर वे थिएटर और सिनेमा को अपनी अनमोल कहानियां देते रहेंगे। भट्ट साहब के इस फैसले पर और आज के बदलते कॉर्पोरेट सिनेमा पर आपकी क्या राय है? हमें कमेंट करके जरूर बताएं!
