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Karan Johar KANK Hate: ‘कभी अलविदा ना कहना’ के 20 साल पर करण जौहर का छलका दर्द, क्यों कहा गया था ‘एंटी-संस्कारी’?

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Karan Johar KANK Hate
Karan Johar KANK Hate

हिंदी सिनेमा में पारिवारिक मूल्यों और भव्य शादियों को परदे पर खूबसूरती से उतारने के लिए पहचाने जाने वाले मशहूर फिल्म निर्माता और निर्देशक करण जौहर एक बार फिर सुर्खियों में हैं। साल 2006 में रिलीज हुई उनकी बहुचर्चित और विवादित फिल्म ‘कभी अलविदा ना कहना’ (KANK) के 20 साल पूरे होने के मौके पर करण जौहर ने अपने दिल का हाल बयां किया है। सोशल मीडिया पर शेयर की गई एक इमोशनल पोस्ट के जरिए उन्होंने याद किया कि कैसे इस फिल्म की वजह से उन्हें दर्शकों और समीक्षकों के तीखे गुस्से का सामना करना पड़ा था। फिल्म रिलीज होने के बाद पैदा हुए विवाद, आलोचनाओं और Karan Johar KANK Hate ने उन्हें अंदर तक हिलाकर रख दिया था। उस दौर में कई लोगों ने तो इस फिल्म को भारतीय परंपराओं के खिलाफ बताते हुए करण जौहर को ‘एंटी-संस्कारी’ (Anti-Sanskaari) तक करार दे दिया था।

20 साल बाद क्यों याद आया Karan Johar KANK Hate का दौर?

जब साल 2006 में ‘कभी अलविदा ना कहना’ सिनेमाघरों में उतरी, तो भारतीय दर्शकों के लिए एक शादीशुदा पुरुष और महिला के बीच एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर (शादी के बाहर संबंध) के मुद्दे को इतनी बेबाकी से देखना बेहद चौंकाने वाला था। शाहरुख़ खान, रानी मुखर्जी, अभिषेक बच्चन और प्रीति जिंटा जैसे बड़े सितारों से सजी इस फिल्म से लोगों को ‘कुछ कुछ होता है’ या ‘कभी खुशी कभी गम’ जैसी पारिवारिक ड्रामा की उम्मीद थी। लेकिन जब पर्दे पर रिश्तों का कड़वा सच और बेवफाई दिखाई गई, तो माहौल पूरी तरह बदल गया।

करण जौहर ने अपनी पोस्ट में लिखा कि 20 साल पहले उन्हें दर्शकों की ओर से जैसा मिला-जुला और आक्रामक रिएक्शन मिला, उसने उन्हें मानसिक रूप से काफी प्रभावित किया था। Karan Johar KANK Hate कोई सामान्य आलोचना नहीं थी, बल्कि यह एक सांस्कृतिक बहस बन गई थी। कुछ लोगों ने जहां इसे एक साहसी और अलग कदम बताया, वहीं एक बड़े वर्ग ने इसे ‘एंटी-संस्कारी’ मूल्यों को बढ़ावा देने वाली फिल्म कहा। करण के मुताबिक, वे हर तरह की बातें सुन रहे थे—कुछ लोग इसे उनका बेहतरीन काम कह रहे थे, तो कुछ लोग उनसे बेहद नफरत जता रहे थे।

जब स्क्रीनिंग के दौरान करण जौहर को थप्पड़ पड़ने का लगा डर

करण जौहर ने फिल्म की रिलीज की रात हुए एक किस्से का जिक्र करते हुए बताया कि वे चुपके से पास के ही एक थिएटर में ‘पेड प्रिव्यू’ (Paid Preview) देखने गए थे। वे एक पारंपरिक रूप से सजे-धजे मध्यमवर्गीय जोड़े के पीछे बैठे थे। जब फिल्म में देव (शाहरुख खान) और माया (रानी मुखर्जी) के बीच लिफ्ट वाला रोमांटिक सीन आया, तो सामने बैठी महिला के हाथ से पॉपकॉर्न छूट गया। उसके पति ने पहले तो सोचा कि यह कोई ‘ड्रीम सीक्वेंस’ (सपना) है, लेकिन जब उसे अहसास हुआ कि यह असल कहानी का हिस्सा है, तो वह गुस्से में अपनी पत्नी को लेकर थिएटर से बाहर निकल गया।

असली डर तो तब पैदा हुआ जब करण जौहर थिएटर के बाहर निकले। वहां एक महिला अपनी रोती हुई बेटी के साथ करण के पास आई। करण को लगा कि शायद वे फिल्म देखकर भावुक हुई हैं। लेकिन उस महिला ने करण से पूछा— “क्या आप करण जौहर हैं?” जब करण ने हां कहा, तो महिला चिल्लाई— “लज्जा आनी चाहिए आपको! (Shame on you!) मैं अपनी बेटी को आपकी फिल्म यह सोचकर दिखाने लाई थी कि इसमें गाने, डांस और पारिवारिक संस्कार होंगे, क्योंकि यह आपकी फिल्म है। आज ही मेरी बेटी का तलाक हुआ है और आपने उसे यह सब दिखाया!”

करण ने स्वीकार किया कि उस वक्त उन्हें लगा कि वह महिला उन्हें शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचा सकती है या मार सकती है। वे किसी तरह वहां से बचकर निकले, लेकिन उस रात उन्हें अहसास हो गया था कि Karan Johar KANK Hate की लहर कितनी खतरनाक हो सकती है।

एयरपोर्ट लाउंज की वो सीक्रेट मुलाकात जिसने नजरिया बदला

नफरत के इस दौर के बीच एक ऐसी घटना भी घटी जिसने करण जौहर को थोड़ा दिलासा दिया। फिल्म रिलीज के कुछ हफ़्तों बाद करण जब एक एयरपोर्ट के लाउंज में बैठे थे, तो एक महिला उनके पास आई। उस समय करण इतने डरे हुए थे कि उन्हें लगा कि फिर से कोई उन पर गुस्सा निकालने आ रहा है।

लेकिन उस महिला ने दबी आवाज में करण से कहा— “मुझे आपकी फिल्म बहुत पसंद आई… लेकिन मैंने अपने पति से झूठ बोला कि मुझे यह घटिया लगी।” जब करण ने हैरान होकर पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया, तो महिला ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया— “अगर मैं अपने पति से कहती कि मुझे फिल्म पसंद आई है, तो वे मुझसे पूछते कि इसमें क्या पसंद आया! इसलिए झूठ बोलना ही सेफ था।”

इस वाकये ने करण जौहर को यह समझने में मदद की कि समाज में बहुत से लोग इस कड़वे सच से जुड़ाव महसूस कर रहे थे, लेकिन सामाजिक दबाव और परंपराओं के चलते वे इसे खुले तौर पर स्वीकार नहीं कर पा रहे थे।

क्या वाकई ‘कभी अलविदा ना कहना’ में एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर को बढ़ावा दिया गया था?

करण जौहर पर लगा सबसे बड़ा आरोप यह था कि उन्होंने अपनी फिल्म के जरिए बेवफाई (Infidelity) और एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर्स को सही ठहराने की कोशिश की है। हालांकि, 20 साल बाद करण जौहर ने इस पर अपनी सफाई देते हुए स्पष्ट किया है कि उनका मकसद कभी भी बेवफाई को प्रमोट करना नहीं था।

करण का कहना है कि फिल्म का संदेश यह था कि शादी की सीमा से बाहर जाकर प्यार या लालसा ढूंढना आपके पूरे परिवार और रिश्तों की बुनियाद को तबाह कर देता है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि एक निर्देशक के तौर पर इस फिल्म में कुछ कमियां थीं। फिल्म का बजट और स्केल जरूरत से ज्यादा बड़ा था और मुख्य धारा के दर्शकों को लुभाने के लिए इसमें कुछ अनावश्यक और भव्य गाने डाले गए थे। लेकिन इसके बावजूद, फिल्म की नीयत और दिल अपनी जगह बिल्कुल सही थे।

समाज की सोच और Karan Johar KANK Hate में 20 सालों में कितना बदलाव आया?

समय के साथ दर्शकों का नजरिया और सिनेमा को देखने का तरीका काफी बदल चुका है। करण जौहर बताते हैं कि आज 20 साल बाद, बहुत से लोग उनसे मिलते हैं और कहते हैं कि 2006 में वे इस फिल्म से खुद को जोड़ नहीं पाए थे और उन्होंने भी Karan Johar KANK Hate का हिस्सा बनकर फिल्म की आलोचना की थी, लेकिन आज वे इस रिश्ते की जटिलता को बेहतर ढंग से समझते हैं।

करण का मानना है कि इंसान अक्सर रिश्तों में सिर्फ ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ (सही या गलत) जवाब ढूंढना चाहता है, जबकि जिंदगी अक्सर ‘ग्रे शेड्स’ (धुंधले पहलुओं) में चलती है। ‘कभी अलविदा ना कहना’ ने उसी ग्रे एरिया को छूने की कोशिश की थी।

निष्कर्ष (Conclusion)

करण जौहर की फिल्म ‘कभी अलविदा ना कहना’ भारतीय सिनेमा के इतिहास की उन चुनिंदा फिल्मों में से एक है जिसने समाज के उस पहलू पर रोशनी डाली, जिसे लोग अक्सर कालीन के नीचे छुपा देना पसंद करते हैं। हालांकि रिलीज़ के वक्त Karan Johar KANK Hate और दर्शकों के गुस्से ने निर्देशक को हिलाकर रख दिया था, लेकिन 20 साल बाद भी इस फिल्म पर होने वाली चर्चा यह साबित करती है कि यह फिल्म दर्शकों को सोचने पर मजबूर करने में पूरी तरह सफल रही थी। करण जौहर ने अपनी पोस्ट के अंत में अपनी पूरी स्टारकास्ट और क्रू का धन्यवाद करते हुए कहा कि भले ही लोग इस फिल्म से प्यार करें या नफरत, लेकिन कोई भी इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता।

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